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ताकि सनद रहे : संघ और उससे असहमति के कारण

संघ का हिन्दू राष्ट्र का अभियान देश विरोधी है


❗ताकि सनद रहे : संघ और उससे असहमति के कारण

 

▪️डॉ राकेश पाठक

 

फेसबुक पर चल रहे विमर्श में हमारे एक ‘संघ दक्ष’ मित्र ने ‘राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ’ से हमारी वैचारिक असहमति पर प्रश्न किया था। उनके प्रश्न के उत्तर में विस्तार से कुछ लिखा वह यहां प्रस्तुत है।

संघ और उसकी विचारधारा के प्रति हमारी असहमति के अनेक कारण हैं, जिनमें से संक्षेप में कुछ इस तरह हैं..

१) देश की आज़ादी की लड़ाई में संघ का किंचित भी योगदान नहीं है। बल्कि जब देश आज़ादी की लड़ाई लड़ रहा था तब संघ अंग्रेजों के साथ खड़ा था।

यह सब ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित है।

ध्यान रहे संघ भारत छोड़ो आंदोलन तक से दूर रहा था।

कृपा कर वो फर्जी दावा न दोहराइए की ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में ‘एकमात्र’ शहीद संघ का कार्यकर्ता था।

जब कुछ साल पहले संघ ने बकायदा इस दावे का एक पोस्टर वायरल किया था तब हमने उसी समय सुबूतों के साथ बता दिया था कि यह दावा भी संघ के हजारों झूठे दावों की तरह पूरी तरह झूठ है।

इस पर हमारा एक विस्तृत वीडियो है। देखिएगा।

२) यह भी ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित है कि 1925 में स्थापित संघ के पास स्वतंत्रता संग्राम का एक भी नायक महानायक नहीं है।

आप जानते ही हैं कि इस हीनता ग्रंथि से निकलने के लिए संघ प्रायः सरदार पटेल, नेताजी सुभाषचंद्र बोस, शहीदे आज़म भगत सिंह जैसे महानायकों पर अपना टैग लगाने का प्रयास करता रहता है।

जबकि कटु सत्य यह है कि इनमें से कोई भी संघ की मूल विचाराधारा के आसपास भी नहीं था।

सच यह भी है कि अगर इनमें से एक भी अगर आज होता तो संघ की कथनी, करनी देख कर क्या नहीं कर देता ये आप अच्छी तरह जानते हैं।

३) आज़ादी के बाद जब देश का संविधान बना और उसे लागू किया गया तो संघ ने इसका विरोध किया।

संघ ने न संविधान को स्वीकार किया और न राष्ट्रध्वज के रूप में तिरंगे को।

संघ के मुखपत्र ऑर्गनाइजर में छपा आलेख तो आपके संज्ञान में होगा ही।

सबसे पहले 17 जुलाई 1947 को तिरंगे को राष्ट्रध्वज के रूप में अस्वीकार करते हुए लेख छपा था।

इसके बाद एन आज़ादी के एक दिन पहले 14 अगस्त 1947 को संघ के मुख पत्र ऑर्गनाइजर ने एक बार फिर संपादकीय लिख कर तिरंगे को अस्वीकार किया।

संघ ने तीन रंग के कारण तिरंगे को ‘अशुभ’ कहा था और भगवा ध्वज का समर्थन किया था।

26 नवंबर,1949 को देश की संविधान सभा ने संविधान को अपनाया था और उसके मात्र चार दिन बाद 30 नवंबर को संघ के मुख पत्र ‘ऑर्गनाइजर’ में संपादकीय लेख छपा था जिसमें संविधान को पूरी तरह ख़ारिज कर दिया गया था।

26 जनवरी,1950 को संविधान लागू होने के बाद भी संघ मनुस्मृति का राग अलापता रहा।

6 फरवरी, 1950 को आर्गनाइजर में फिर एक लेख छपा जिसका शीर्षक था –

“Manu Rules our Hearts”

इसके लेखक थे Sankar Subba Aiyar।

यानी संघ संविधान की जगह मनुस्मृति की बात दोहराता रहा।

हालांकि संघ ने कालान्तर में संविधान और तिरंगे को स्वीकार कर लिया है लेकिन आज भी वो मनुस्मृति का पक्षधर है यह कोई छुपा हुआ तथ्य नहीं है।

(संघ मुख्यालय पर आज़ादी के बाद आधी सदी तक तिरंगा नहीं फहराया गया ये तो आप जानते ही हैं।)

४) महात्मा गांधी की हत्या में संघ के दुष्प्रचार और हत्यारे गोडसे पर संघ/ सावरकर की कृपा।

आप जानते ही हैं कि गांधी जी की हत्या में संघ द्वारा फैलाए गए महा झूठ का बहुत बड़ा योगदान था।

यह सरदार वल्लभ भाई पटेल ने ही लिखा है कि संघ के दुष्प्रचार ने गांधी की जान ले ली।

गृह मंत्री के तौर पर सरदार पटेल ने प्रो श्यामप्रसाद मुखर्जी को 18 जुलाई, 1948 को लिखे पत्र में स्पष्ट लिखा कि बापू की हत्या के लिए RSS और हिंदू महासभा के दुष्प्रचार ने ऐसी परिस्थितियां बनाई जिसके कारण गांधी जी की हत्या की दुखद त्रासदी घटित हुई।

पटेल ने 11 सितंबर 1948 को संघ के तत्कालीन सर संघ चालक माधव सदाशिव गोलवलकर को लिखे पत्र में स्पष्ट लिखा कि संघ और उसके नेताओं के जहरील भाषणों के चलते गांधी जी की हत्या हुई।

पटेल ने लिखा कि संघ के कार्यकर्ताओं ने गांधी जी की हत्या का उत्सव मनाया और मिठाई भी बांटी थी।

महात्मा गांधी जैसे अहिंसा के पुजारी की हत्या की परिस्थितियां बनाने वाले संगठन और विचारधारा से हमारी असहमति स्वाभाविक ही है।

हां आप जानते ही हैं कि अगर पंडित नेहरू ने सरदार पटेल की सलाह मानी होती तो संघ का आज नामलेवा भी नहीं होता।

(सब कुछ दस्तावेजी प्रमाण के साथ उपलब्ध है।)

आज़ाद भारत में संघ पर तीन बार प्रतिबंध लगा ये तो आप जानते ही हैं।

५) संघ का मूल विचार ही भारत के विविधता के स्वरूप के एकदम विरुद्ध और एकांगी है। इसका ‘हिंदू राष्ट्र’ की स्थापना का अभियान वास्तव में भारत, भारतीयता, लोकतंत्र के विरुद्ध है।

यह विचार ही वह मूलतः आईडिया ऑफ इंडिया के प्रतिकूल है।

एक संवैधानिक, लोकतांत्रिक राष्ट्र राज्य को धर्म विशेष का राष्ट्र बनाने का विचार वास्तव में देश विरोधी विचार है।

(जैसे खालिस्तान की मांग देश विरोधी है वैसे ही हिंदू राष्ट्र की मांग भी।)

भारत का जो ताना बाना सदियों की विरासत, आपसी सद्भाव, परस्पर विश्वास में रचा बसा है संघ उसे धीरे धीरे खोखला कर रहा है।

६) संघ, उसकी राजनैतिक इकाई भाजपा और आनुषंगिक संगठन दिन रात नफ़रत और झूठ की राजनीति करते हैं यह किसी लोकतंत्रिक और सभ्य समाज में कैसे स्वीकार किया जा सकता है?

इसके लिए आपको मात्र नरेंद्र मोदी जी, योगी आदित्यनाथ जी, शुभेंदु अधिकारी जी, हिमंता बिस्वसरमा जैसे नेताओं के भाषण सुन लेना ही पर्याप्त होगा।

क्या आज तक बीजेपी के पितृ संगठन के मुखिया के नाते सर संघ चालक जी ने कभी ऐसे बयानों, भाषणों पर सार्वजनिक रूप से आपत्ति दर्ज की है?

कृपया यह न कहिये कि संघ और भाजपा अलग अलग है। अब इस देश में शायद ही कोई होगा जो इस तर्क (कुतर्क) को स्वीकार कर सकता है।

७) इस समय देश में हिंदू रक्षा, गौरक्षा आदि के नाम पर जितने संगठन, समूह सक्रिय हैं उन्हें संघ का प्रत्यक्ष/परोक्ष संरक्षण प्राप्त है यह सर्वविदित ही है।

ये संगठन किस तरह दूसरे धर्मों के उपासना स्थलों पर हमले कर रहे हैं, दूसरे धर्म के मानने वालों के साथ क्या कुछ हो रहा है यह आप हमसे बेहतर जानते ही हैं।

क्या आज तक संघ के सम्मानीय सर संघ चालक ने इन संगठनों के घृणित अभियानों के विरुद्ध कोई चेतावनी दी है या कोई असंतोष जताया है?

८) संघ और उसके राजनीतिक मुखौटे भाजपा की कथनी करनी के फ़र्क के बारे में भी आप हमसे ज्यादा जानते ही होंगे।

अभी पांच राज्यों के चुनाव में माननीय मोदी जी से लेकर पूरी पार्टी बंगाल और असम में मांसाहार के पक्ष में प्रचार करती रही।

खुद मोदी जी ने बंगाल में ज्यादा से ज्यादा मछली उपलब्ध करवाने का वादा किया।

हिमंता तो असम में गौ मांस खाने तक की हिमायत कर रहे थे। बीजेपी नेता मछली लेकर चुनाव प्रचार करते और  अनुराग ठाकुर जैसे नेता मछली खाते देखे गए।

क्या हमें आपको बताना पड़ेगा कि इसी विचार समूह के हरावल दस्ते पूरे देश में मांसाहार के नाम पर लोगों की मॉब लिंचिंग करते हैं।

जिस भाजपा के नेता बंगाल में मछली खा रहे थे उसी के नेता दिल्ली में चितरंजन पार्क इलाके में मछली विक्रेताओं की दुकानों को बंद करवाने के लिए बवाल करते हैं।

क्या यह सब संघ के संरक्षण और उसकी मौन स्वीकृति से नहीं हो रहा?

९) आप जानते ही हैं कि संघ किस तरह पूरे देश में खानपान से लेकर पहनावे और जीवन जीने के हर क्षेत्र में अपनी मनमानी थोपना चाहता है।

दूसरे धर्म, जाति, क्षेत्र आदि के लोगों को उनके खानपान, पहनावे के नाम पर संघ के आनुषांगिक संगठन और उसके संरक्षण में पल रहे अनेक अनाम समूह क्या कुछ नहीं कर रहे यह आपसे भी छुपा नहीं होगा।

१०) संघ स्त्रियों और दलितों के प्रति बराबरी का भाव नहीं रखता यह भी सर्वविदित है।

आधी आबादी वाली स्त्रियों का काम पति को प्रसन्न रखना / चौके चूल्हे तक सीमित रखने वाले भाव तो स्वयं सर संघ चालक जी ही प्रकट कर चुके हैं।

दलितों को लेकर भी संघ का विचार क्या है यह हमें बताने की आवश्यकता भी नहीं है, आप हमसे बेहतर जानते हैं।

क्या आप बता सकते हैं कि संघ के सर संघ चालक के पद पर किसी महिला या दलित को पहुंचने में और कितनी सदियाँ लगेंगीं?

प्रिय मित्र,

उपरोक्त के अलावा भी अनेक अन्य कारण हैं जिनके आधार पर हम ऐसा मानते हैं कि संघ देश के संवैधानिक ढांचे और समाजिक ताने बाने के प्रतिकूल विचार वाला संगठन है।

एक सच्चे भारतीय और एक साधारण पत्रकार के नाते हमारा कर्तव्य है कि हम समाज और देश को समय समय पर इस विचारधारा और संगठन के प्रति सचेत करते रहें।

हम भविष्य में भी यथासम्भव अपने इस कर्तव्य का पालन करने का प्रयास करते रहेंगे।

▪️🔸

यह विमर्श जिस मूल विषय से शुरू हुआ था उस पर भी कुछ कहना है।

मूल विषय था जगदीश उपासने जी की स्त्री विरोधी, यौन कुंठित पोस्ट।

आपको उनके बारे में हमारी पोस्ट में संघ का संदर्भ आने पर आपत्ति है।

हमारा मत ये है कि उपासने जी की संघ से संबद्धता निर्विवाद रूप से सिद्ध है। वे संघ के मुख पत्र ‘पाञ्चजन्य’ और ‘आर्गनाइजर’ में महत्वपूर्ण पदों पर रहे हैं। तब उनके बारे लिखते समय स्वाभाविक ही है कि उन्हें ‘संघ दक्ष’ लिखा जाता।

वे स्वयं भी संघ से अपने सरोकार छिपाते नहीं हैं तो उनके बारे में लिखते समय संगठन का उल्लेख होगा ही।

यद्यपि आपने अपने कमेंट में लिखा है कि आप भी उनकी पोस्ट को अनुचित मानते हैं।

क्या ही बेहतर होता कि आप स्वतंत्र रूप से अपनी वॉल पर उपासने जी के कुत्सित विचार, कृत्य का प्रतिवाद करते हुए कुछ लिखते।

यह अपेक्षा भी मात्र इसलिए है कि उपासने जी दो कौड़ी के साधारण ट्रोल नहीं हैं, वे वरिष्ठ पत्रकार,संपादक, कुलपति भी रहे हैं।

आप जैसे श्रेष्ठ और वरिष्ठ सम्पादक भी उनके कृत्य के विरोध में कुछ लिखते तो बेहद प्रभावी होता।

फिर भी आपने कमेंट में ही उनसे असहमति व्यक्त की इतना भी पर्याप्त है।

आशा है हम अपने अति अल्प अध्ययन और अति सूक्ष्म बुद्धि से अपना पक्ष रख सके होंगे।

निश्चित ही आपके विचार इससे पृथक ही हैं जो कि आपका अधिकार है।

हमारे विचारों से आपकी असहमति भी स्वाभाविक ही है।

हम गांधी के मार्ग पर हैं और आप संघ के। ये दोनों मार्ग कभी किसी बिंदु पर एकाकार नहीं हो सकते।

तथापि हम आपकी अपनी विचारधारा के प्रति निष्ठा और समर्पण का सदैव सम्मान करते हैं।

इति।

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